Saturday, February 4, 2012

न्याय का दिखा दम, अपराध हुआ कम


न्याय का दिखा दम, अपराध हुआ कम

 

संजय उपाध्याय | फरवरी 3, 2012 18:30
 
लोग इसे बिहार का 'स्वर्णद्वीप' भी कहते हैं. यहां के करीब 75 हजार लोग खाड़ी देशों में रह कर हर महीने करोड़ों रूपये भेजते हैं. यहां की मनी आर्डर अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है कि निजी छोड़ कर अकेले लीड बैंक के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीयकृत बैंकों में 3,600 करोड़ रूपये जमा हैं. यहां एडिडास के सफेद जूते पहने और महंगी बाइक पर सवार युवक आमतौर पर दिख जाते हैं. लालू-राबड़ी शासन काल में यहां किसी लोकतांत्रिक सरकार का नहीं, बल्कि यहां के बाहुबली सांसद रहे शहाबुद्दीन का सिक्का चलता था. कुछ साल पहले सीवान एक खौफनाक जगह थी, जहां दिनदहाड़े हत्या, अपहरण आम था. तेजतर्रार आईपीएस-आईएएस अधिकारियों को भी वहां के सांसद रहे शहाबुद्दीन के साथ समझौता करके रहना पड़ता था. पर, वे दिन अब नहीं रहे. 2005 में चुनाव आयोग की सख्ती और 2006 में स्पीडी ट्रायल की शुरुआत से ही बिहार की राजनीतिक-सामाजिक फिजा बदलने लगी थी. फिलहाल, शहाबुद्दीन सीवान जेल में ही सलाखों के पीछे हैं. अब, वहां 'शहाबु' या 'साहेब' की नहीं, कानून की चलती है. दिन क्या...रात में भी लोग वहां अब बेधड़क घूमते नजर आ जाते हैं. 

अकेले शहाबुद्दीन ही बदल रहे बिहार के नजीर नहीं हैं. अलग-अलग जगह के क्षत्रप, जो सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को ही हाईजैक कर चुनाव की हवा को अपने पक्ष में कर लेते थे-वे भी सलाखों के पीछे हैं. उदाहरण के तौर पर अपराध के घोड़े पर सवार सतीश पांडेय (गोपालगंज), राजन तिवारी (चंपारण), मुन्ना शुक्ला (तिरहुत), आनंद मोहन (सहरसा),पप्पू यादव (पूर्णिया-सहरसा) तथा बिंदु सिंह (जहानाबाद) के जमाने लद गए, जब वे अपराध को अंजाम दे-दिलाकर कानून की लंबी-जटिल प्रक्रिया का लाभ उठाते हुए जमानत लेकर बाहर या वारंट लेकर जेल के भीतर स्टेट गेस्ट का मजा लेते रहते थे. आलम यह है कि स्पीडी ट्रायल के तहत करीब 65 हजार अभियुक्त सलाखों के पीछे हैं. 

गंडक के दुर्गम दियारे से लेकर चंपारण के घने जंगल यानी बिहार के मिनी चंबल के डाकुओं को 80 से 90 के दशक में सत्ता के गलियारे में भी घूमता देखा जाता था. दिन-दहाड़े लोगों को उठा लेना और फिरौती वसूलने का काम इनका जंगल उद्योग बना हुआ था. डकैतों के इन गिरोहों में सबसे खतरनाक सरगना वासुदेव यादव के खिलाफ यूपी, बिहार और नेपाल में दर्जनों अपराध दर्ज थे और पुलिस उसे पकडऩे में नाकाम. करीब तीन दशकों की फरारी के दौरान उसने संवाददाता को बताया था कि पुलिस के आला हुक्मरान तक उससे अपराधी को पकडऩे के लिए मदद की गुहार लगाते हैं. 

फिलहाल, वह आत्मसमर्पण कर बेतिया जेल में है. उसके साथ, भांगड़ यादव, सतन यादव और रासबिहारी यादव भी वहीं खिचड़ी खा रहे हैं. सूबे के पुलिस महानिदेशक बनने से कई वर्षों पूर्व चंपारण में दस्यु उन्मूलन अभियान की लगाम थामे अभयानंद ने बताया कि 'पहले सजा देने की प्रक्रिया धीमी थी. स्पीडी ट्रायल, स्पेशल कोर्ट व फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से लंबित पड़े मामलों की सुनवाई की गई. इनमें स्पीडी ट्रायल की भूमिका अहम है. जनवरी, 2006 से दिसंबर, 2011 तक 65 हजार से भी अधिक अभियुक्त सलाखों के पीछे हैं. करीब 150 को तो फांसी की सजा सुना दी गई है.' 

दिलचस्प यह है कि मोटरसाइकिल लूट के एक मामले में पुलिस और स्पीडी ट्रायल ने इतना तेज काम किया कि जनवरी, 2012 में अपराध घटने के महज 10 दिनों में ही सजा सुनाकर देश में एक मिसाल पेश की है. 12 जनवरी को तीन लुटेरे पिस्तौल और देसी रिवॉल्वर के साथ मोटरसाइकिल लूटते पकड़े गए, 14 जनवरी को पुलिस ने चार्जशीट जमाकर स्पीडी ट्रायल के लिए कोर्ट से गुहार लगाई. फास्ट ट्रैक कोर्ट ने दैनिक स्तर पर मामले की सुनवाई करते हुए 23 जनवरी को तीन वर्षों तक सश्रम कारावास की सजा सुना दी. 

हाल के दिनों में स्पीडी ट्रायल नतीजों से उत्साहित पुलिस महानिदेशक ने घोषणा की है कि अब तीन महीने के भीतर ही फैसला सुना दिया जाएगा. पुलिस अधिकारियों के अनुसार जूनियर अफसरों द्वारा की गई जांच-पड़ताल के कार्यों की वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर की जा रही मासिक समीक्षा और विजिलेंस के भय से भी अपराध निरोधी माहौल तैयार हुआ है. लोगों में जागृति भी आई है. अपराध होने पर लोगों का आक्रोश सड़कों पर भी दिखने लगता है. नतीजा, निचले स्तर पर भी पुलिस सख्त हुई है. स्पीडी ट्रायल में तो चश्मदीद अथवा गवाह को मुकरने का मौका तक नहीं मिलता.

पहले गवाह को रूपये-पैसों का लालच अथवा डरा-धमकाकर मुकरने के लिए बाध्य कर दिया जाता था. सीवान के आरक्षी अधीक्षक अमृत राज कहते हैं, 'अपराध के खिलाफ त्वरित कार्रवाई  हो रही है.' हालांकि, अब भी जर्मनी से अधिक जनसंख्या वाला बिहार बाढ़, नक्सल व जातीय द्वेष से उबर नहीं सका है, लेकिन अपराध के मसले पर नकेल इस तरह कसी है कि, पलायन कर रहे व्यापारी लौटने लगे हैं.

बहरहाल, अपराधियों को जेल से निकलने के बाद भी चैन नहीं मिलने वाला. 14 जनवरी को मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने घोषणा की है कि सभी अपराधियों के कृत्यों को वेबसाइट पर डालते हुए उन्हें किसी तरह का लाइसेंस, पासपोर्ट तथा अन्य उन सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा, जो एक बोनाफाईड नागरिक को मिलता है, ताकि जेल से छूटने के बाद भी उन्हें अहसास होता रहे कि उन्होंने कभी अपराध किया था. मतलब, एक तरह का सामाजिक दंड. प्रथम चरण में 1,450 लोगों की सूची बिहार सरकार ने वेबसाइट पर जारी कर दी है. जल्द ही अन्य लोगों सूची को भी साइट पर जल्द डाल दिया जाएगा. स्पीडी ट्रायल के बाद अपराध नियंत्रण के मामले में यह अपने किस्म की एक अलग ही पद्धति है.

Wednesday, February 1, 2012

Bihar to frame policy for police jobs to sportspersons: Nitish

Patna, Feb 1 (PTI) Bihar government will formulate a policy to provide jobs to sportspersons with distinguished achievements in the police department, Chief Minister Nitish Kumar said today. The recruitment would be made in the ranks ranging from constable to the DSP, Kumar said after inaugurating the 60th All India Police Volleyball (Cluster) Championship at the BMP premises here. The government was also considering a proposal to give out-of-turn promotion to policemen who shine in sporting events at the national and international level, he said. Stating that the state government was committed to promote sports at the grassroot level, Kumar said all required infrastructure would be put in place for that. The Chief Minister directed the DGP, Abhayanand, to devise a schedule to hold state level sports meet for the police personnel every year. A few years ago the state was known for lawlessness, he said and lauded the police department for helping transform Bihar to a "peaceful and law abiding" state. The chief minister said the growth in the inflow of tourists in Bihar could be attributed to the changed perception of the state as a law abiding and peaceful place.

Tuesday, January 31, 2012

'इसी तरह बढ़ता रहे मेरा गौरव, यही है कामना'


मैं चिताप खुर्द गांव हूं। प्रखंड मुख्यालय आमस से 15 किलोमीटर एवं अनुमंडल मुख्यालय शरेघाटी से 5 किलोमीटर दूर मोरहर नदी के तट पर बसा हूं। करीब 300 वर्ष पहले मेरी बंजर भूमि पर लोगों का निवास शुरू हुआ था। मेरा नाम बहुत कम लोग जानते थे, जिससे मेरे दिल में एक टीस उठती रहती थी। सोचता था इस भूमि पर कोई ऐसा व्यक्ति पैदा हो, जो मेरे नाम को रोशन कर सके। जब सन 1985 में जगतानंद सिंह को बिहार का डीजीपी बनाया गया, तो मैं उस दिन कितना खुश था, बयां नहीं कर सकता। जगतानंद मेरे ही यहां जन्मे और यहीं से शिक्षा प्राप्त किये। वर्ष 2011 में सरकार ने इसी चिताप खुर्द में जन्मे श्री अभयानंद को बिहार का नया डीजीपी बनाया। दोनों पिता-पुत्र की इस उपलब्धि पर मुझे खुशी होती है। आज मैं बहुत खुश हूं कि मेरे गांव में जन्मे दो व्यक्ति डीजीपी जैसे शीर्ष पद को पाने में सफल हुए। मुझे अपने सभी कामयाब बेटों पर बेहद गर्व है।
मेरा नाम चिताप खुर्द क्यों रखा गया? इसकी जानकारी आज ढेर सारे लोगों को नहीं है। पर, मुझे लगता है कि मेरा नाम चिताप खुर्द इसलिए रखा गया, क्योंकि मेरे सामने नदी के पार वाले गांव का नाम चिताप कला है, जो शेरघाटी प्रखंड में है। मेरी बंजर भूमि पर सबसे पहले, जो अब महादलित के नाम से जाने जाते हैं, उन्हीं लोगों ने निवास शुरू किया था। फिर, कुछ मुस्लिम लोगों ने भी अपना बसेरा मेरे यहां बनाया। लेकिन, आज से करीब 40 वर्ष पहले यहां रह रहे मुस्लिम समुदाय के लोग स्वेच्छा से शेरघाटी प्रखंड में बारहुसैनगंज में जाकर बस गए। फिलवक्त मेरे यहां एक भी मुस्लिम नहीं रहते हैं। वर्तमान में यहां 60 घर भूमिहार, 225 घर महादलित, 50 घर मल्लाह, 4 घर कहार, 7 घर ठाकुर एवं 2 घर यादव जाति के लोग जीवन गुजार रहे हैं। मेरे यहां की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस गांव के 30 लोग इंजीनियर, 5 डाक्टर, 8 प्रोफेसर, 20 अधिवक्ता हैं। आमस के प्रखंड प्रमुख अजय सिंह इसी चिताप खुर्द के निवासी हैं। बुजुर्ग सूर्यनारायण सिंह, अरविंद कुमार सिंह, वार्ड सदस्य चुन्नु सिंह इठलाते हैं कि उनका गांव अभयानंद की ईमानदारी को लेकर चर्चित हुआ है। अभयानंद के भाई अजयानंद, दिल्ली में रेलवे विभाग में डीजीएम के पद पर कार्यरत हैं, वहीं इस गांव के प्रशांत भूषण, भागलपुर में इन्कम टैक्स कमिश्नर के पद पर कार्यरत हैं। इंदूभूषण प्रसाद सिंह भागलपुर से एडीएम पद एवं कामेश्वर सिंह एडीएम पटना से रिटायर्ड हुए। मैं बिहार के वर्तमान डीजीपी अभयानंद के पिता जगतानंद से इतना खुश हूं कि गांव में बने उनके स्मृति चिह्न पर रोज शत्-शत् नमन करता हूं। साथ ही यह कामना करता हूं कि उनकी तरह और भी लोग विभिन्न शीर्ष पदों पर आसीन होकर मेरे गौरव को बढ़ाते रहें।
अपने पिता को श्रधांजली देते हुए - श्री अभयानंद , पुलिस प्रमुख , बिहार 
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आंकड़ों की नजर में चिताप खुर्द
गांव की आबादी 53 हजार
विद्यालय -1
स्वास्थ्य उप केन्द्र 1
आंगनबाड़ी केन्द्र 2
डाकघर- 1
प्रस्तुति- अनवर हुसैन सोनी

Tuesday, January 24, 2012

DGP reviews Police Games preparations


PATNA: Bihar DGP Abhayanand on Monday reviewed preparations for the All India Police Games to be held from February 1 to 5 atMithilesh Stadium here. The mascot for the games is 'dolphin'.
Speaking on the occasion, Abhayanand said that Bihar had been given a cluster of games which include volleyball, handball, kabaddi and basketball, to be organized at the ensuing 60th All India Police Games. About 28 teams would be participating in the games. While the exact number of participants in the games would be 1,597, the number of technical officials and referees would be 103, he said.
Expressing satisfaction on the preparations being made for the games, the DGP said a comprehensive plan has been worked out to hold the games successfully here. "It is a proud moment for Bihar police to organize such a historic event at this stadium," he said.

28 states to take part in 60th All India Police Volleyball

Patna, Jan 23 (PTI) Altogether 28 states will participate in the 60th All India Police Volleyball (Cluster) Championship, 2012 to be held in Bihar from February 1 next. Altogether 1597 players from 28 states will take part in the five-day tournament from February 1-5, 2012 being held to coincide with the centenary celebration of the foundation of the Bihar, Director General of Police (DGP) Abhayanand told reporters here. The chief minister Nitish Kumar will inaugurate the national volleyball championship for the police at the BMP ground on February 1 next, he said. The policemen from across the country will also participate in other disciplines like Basketball, Handball, Kabaddi besides Volleyball, Abhayanand said. 

स्पीडी ट्रायल तीन महीने में पूरा करने का लक्ष्य


पटना, जागरण ब्यूरो : स्पीडी ट्रायल के तहत अपराधियों को सजा दिलाये जाने के मामले को दो-तीन महीने में निपटाने के लक्ष्य पर पुलिस ने काम शुरू कर दिया है। डीजीपी अभयानंद ने बताया कि आने वाले महीने में दर्जनों ऐसे मामले आने हैं जिसमें अपराधियों को सजा दिलाने की प्रक्रिया दो-ढाई महीने में ही पूरी होगी।
उन्होंने बताया कि आरक्षी अधीक्षकों को विशेष रूप से इस तकनीक के बारे में बताया गया है कि किस तरह से ट्रायल की पूरी प्रक्रिया दो-तीन माह के भीतर पूरी की जाये। संवेदनशील मामलों के साथ-साथ विशेष प्रतिवेदित कांडों में विशेष रूप से ध्यान दिया जाना है। सरकारी वकीलों को भी समन्वय बनाने का निर्देश है।
पिछले वर्ष नौ सितंबर को लखीसराय के सूर्यगढ़ा में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी वीरेंद्र कुमार मिश्रा को गोली मार दी गयी थी। पुलिस ने वरुण कुमार नाम के अपराधी को भागते समय पकड़ लिया था। वह हथियार भी बरामद कर लिया था जिससे चिकित्सक को गोली मारी गयी थी। कांड में छह दिन के अंदर चार्जफ्रेम कर लिया था। इस कांड में चार माह में ही फैसला आ गया है। अपराधी को दस वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई गयी है।

Sunday, January 22, 2012

Register Your Complain Here


Fight Against Corruption


Govt Initiative

साभार : हिंदुस्तान दैनिक , पटना संस्करण - खबर को विस्तार से पढ़ने के लिये क्लिक करें 


Saturday, January 14, 2012

Police mull setting up 'safe houses'


PATNA: Police headquarters is planning to set up 'safe house' in each district to keep witnesses of a case, coming from outside districts, so that they could be kept at a secured place.
With the state police making much headway in speedy trial, the movement of witnesses has also increased considerably. A sub-inspector or ASI or for that matter an inspector who files chargesheet in a case, which he investigated, would take witness(es) in their custody as it becomes his duty to produce witnesses in a court. Since there is no facility at the disposal of the police at thana level, the SI or ASI concerned take witness either to his house or at an unsecured place. To prevent the escape of the witness, most of the time the junior police official cuffs his hand with that of the witness with a chain so that the latter may not escape.
DGP Abhayanand said for police it has become a very pathetic state of affairs. He said with the provision of a safe house, the junior police officers at least can have a place to keep witnesses or for that matter an accused at a safe place.
Since it would not be possible for the police headquarters to go in for construction of such a safe house, the DGP is exploring the rule whether he is empowered to take a private house for such a purpose on rent or government's nod is mandatory as finance
is involved in the matter. "Once things get cleared, police will have a safe house in each district," Abhayanand said.

Sunday, January 8, 2012

हौले हौले बोल चाय भी पिलाएगी पुलिस


दैनिक जागरण , पटना संस्करण अपने रविवार विशेष में लिखते हैं :-
हौले-हौले बोल चाय भी पिलाएगी पुलिस
 भुवनेश्वर वात्स्यायन, पटना :
 खाकी वर्दी को रौब और हनक के लिए जाना जाता है। लेकिन अगर वह आपसे बेहद नरम अंदाज में बात करे,
 यूं कहें कि हौले-हौले बात करते हुए आपको चाय पिलाने पास की दुकान पर ले जाए, फिर साथ में बिस्कुट भी 
लेने का आग्रह करे और चाय-बिस्किट का पैसा भी अपनी जेब से दे तो सच में हैरान करने वाली बात होगी। 
पुलिस महकमा प्रयोग के तौर पर यह काम शुरू करने जा रहा है। 50 के करीब पहुंच चुके पुलिसकर्मियों को
 विशेष रूप से इस प्रयोग के लिए चिह्नित किया जा रहा है। एक सरकारी महकमे के माध्यम से उन्हें 
मधुर व्यवहार का प्रशिक्षण दिया जाएगा। विहेवियर ट्रेनिंग का यह काम जल्द ही शुरू होना है।
 डीजीपी अभयानंद कहते हैं कि स्थानीय स्तर पर उग्र भीड़ से निपटने के लिए लाठी चार्ज या फिर जैसे को तैसा
 वाली पुलिसिया कार्रवाई हमेशा कारगर नहीं होती है। पुलिस के जवानों को बारगेनिंग स्किल भी आनी चाहिए। 
हंगामे पर आमदा भीड़ से किस तरह से बात की जाए, इसका प्रशिक्षण भी इस कार्यक्रम के तहत पुलिसकर्मियों 
को दिया जाएगा। हर जगह पर इस तरह की एक यूनिट काम करेगी, जिसे लोगों से बात करने या फिर उन्हें 
समझाने-बुझाने में दक्षता हासिल रहेगी। अधिक उम्र के पुलिस के जवानों से सामान्य तौर पर विधि-व्यस्था का काम
 लेना संभव नहीं हो पाता है। इसी श्रेणी के पुलिसकर्मियों को व्यवहार प्रशिक्षण के लिए चुना जाएगा।
 उन्हें सुबह-शाम संबंधित इलाके में लोगों के घर जाने, मुहल्ले में घूमने और उनसे अच्छे ढंग से बात कर हर रोज
 अपनी रिपोर्ट थाने में देने की जवाबदेही दी जाएगी। इस अभ्यास से थाने का अपना आसूचना तंत्र भी सुदृढ़ होगा।
 महिला पुलिसकर्मियों को भी इस तरह की ट्रेनिंग दिलाई जाएगी। पुलिस मुख्यालय अपने वृद्ध जवानों को यह ट्रेनिंग
 सरकारी महकमे के माध्यम से ही दिलाएगा। भारतीय पुलिस सेवा के ही एक अधिकारी, जो फिलहाल मानव संसाधन
 मंत्रालय के अधीन कार्यरत हैं, की देख-रेख में इस तरह के प्रशिक्षण के कैप्स्यूल विकसित किए गए हैं। 
पुलिस की योजना है कि जवानों का यह विंग सिर्फ इसी तरह के काम करे। इसके अतिरिक्त जवानों की एक यूनिट 
ऐसी भी तैयार की जाएगी, जिसे सिर्फ बड़े-बड़े पुलिस अभियानों में लगाया जा सकेगा। अभियान में जिस तरह की 
सक्रियता रहेगी, उसका उन्हें खास प्रशिक्षण दिया जाएगा। वहीं जवानों का एक विंग को छोटे-मोटे दंगा फसाद से 
जूझने के लिए तैयार किया जाएगा। पुलिस अभी प्रयोग के तौर पर इसे आरंभ करेगी।




Friday, January 6, 2012

सरपंच की पिटाई पर सजा मिलेगी

ग्राम कचहरी भादवि की धारा 107 के तहत एक हजार रुपये का जुर्माना भी लगा सकेगा 1 डीजीपी ने सभी आइजी, डीआइजी व पुलिस अधीक्षकों को भेजी अधिसूचना 1 कारावास की सजा देने का कोई अधिकार नहीं ग्राम कचहरी की न्यायपीठ के निर्णय के खिलाफ तीस दिनों के भीतर ग्राम कचहरी की पूर्ण पीठ के समक्ष अपील दायर किए जाने का प्रावधान धारा 112 के तहत है। पूर्ण पीठ की सुनवाई सात पंचों के द्वारा की जायेगी। जिन सिविल मामलों में ग्राम कचहरी को है सुनवाई का अधिकार- सिविल अधिकारिता के तहत धारा-110 के अनुसार दस हजार रुपये से कम संपत्ति, लगान की वसूली, चल संपत्ति को क्षति पहुंचाने, पशु अत्याचार व बंटवारा से संबंधित मामलों को ग्राम कचहरी में सुना जा सकेगा। भारतीय दंड संहिता के तहत इन धाराओं के तहत ग्राम कचहरी को है सुनवाई का अधिकार- 140, 142, 143, 145, 147, 151, 153,160, 172, 174,178, 179, 269, 277, 283, 285, 286, 289, 290, 294, 294 (ए), 332, 334, 336, 341, 352, 356, 357, 374, 403, 426, 428, 430, 447, 448, 502, 504, 506 व 510. फैसले से क्षुब्ध हो सरपंच को पीटा तो दर्ज होगा विशेष कांड पटना, जागरण ब्यूरो : पुलिस मुख्यालय ने ग्राम कचहरी के क्षेत्राधिकार में पड़ने वाले आपराधिक व सिविल वाद से संबंधित मामलों को सीधे थाने से सरपंच तक भेजे जाने की राह आसन बना दी है। इस बाबत अधिसूचना जारी कर दी गयी है। डीजीपी अभयानंद ने बताया कि इस बारे में सभी प्रक्षेत्रीय आइजी, डीआइजी व पुलिस अधीक्षकों को आदेश भी जारी कर दिया गया है। पुलिस मुख्यालय ने फैसला सुनाने वाले सरपंचों की सुरक्षा व्यवस्था का भी पूरा ख्याल रखा है। डीजीपी अभयानंद ने कहा कि ऐसे दृष्टांत सामने आते रहे हैं कि ग्राम कचहरी व सरपंच द्वारा जब अपने विधिक अधिकारों का प्रयोग किया जाता है तो फैसले की परिधि में आने वाला क्षुब्ध व्यक्ति सरपंच के विरुद्ध ही आपराधिक मामला दर्ज करा देते हैं। कई बार सरपंच पर हमला भी हो जाता है। पुलिस मुख्यालय द्वारा इस बाबत जारी अधिसूचना में इस बात का प्रावधान किया गया है कि ऐसे मामले में हमला करने वाले व्यक्ति पर जो कांड दर्ज हो उन्हें विशेष प्रतिवेदित कांड में शामिल कर लिया जाये। प्राथमिकता के आधार पर पुलिस अधीक्षक के स्तर पर उसका पर्यवेक्षण होगा। थानेदारों के लिए यह प्रावधान है कि धारा 113 के तहत वह ग्राम कचहरी से संबंधित मामलों को वहां भेजेंगे। न्यायालय के स्तर से भी ग्राम कचहरी को मामले भेजे जा सकेंगे। अगर किसी न्यायालय को ऐसा प्रतीत होता है कि मामला ग्राम कचहरी के स्तर पर विचारणीय है तो उक्त मामले को स्थानांतरित कर दिया जायेगा। धारा-115 के तहत न्यायालय स्वत: या सूचना प्राप्त होने पर ग्राम कचहरी द्वारा विचाराधीन मामले को वापस कर देगा।

Tuesday, December 27, 2011

समय बदल रहा, हम भी बदलें

दैनिक जागरण , पटना संस्करण लिखते हैं : 

पटना, कार्यालय संवाददाता : समय बदल रहा है, हम भी बदलेंगे। समस्याएं हैं पर उनके समाधान के कदम भी उठाए जा रहे हैं। पुराने समय से चली आ रही व्यवस्था धीरे-धीरे ही ठीक होगी। पुलिस के सामने भी कई प्रकार की मजबूरी होती है। संविधान के अनुसार ही काम करना पड़ता है। पहले जांच कर लें, फिर एफआईआर लिखें, ऐसा संभव नहीं है। उक्त बातें डीजीपी अभ्यानंद ने शनिवार को कहीं। उन्होंने बिहार चैम्बर आफ कामर्स के सभागार में आयोजित बैठक में पहले व्यवसायी वर्ग की समस्याएं सुनीं और बाद में क्रमवार उनका जवाब दिया। बैठक में उद्यमी समुदाय की ओर से पुलिस महानिदेशक अभ्यानंद का स्वागत करते हुए कहा गया कि उनके कार्यभार ग्रहण करने के बाद से अपराध में जिस तेजी से गिरावट आई है, वह अपने आप में सुखद है। समाज में भयमुक्त वातावरण बना है। संगठित अपराध पर विराम लगा है। आज देश के उन राज्यों की श्रेणी में सूबे की गिनती तीसरे नंबर पर होती है, जहां अपराध दर काफी कम है। बैठक में प्रमुख रूप से ट्रैफिक की समस्या को रखते हुए कहा गया कि सीनियर अफसर से मिलते वक्त लगता है कि उनकी बात सुनी जा रही है, पर थाने आज भी पुरातन शैली में ही काम कर रहे हैं। व्यवहार देख थाने जाने पर भय लगता है। बैठक में उठी समस्याओं पर क्रमवार बोलते हुए डीजीपी अभ्यानंद ने बेतिया के एक मामले का हवाला देते हुए कहा कि टेलीफोन पर मिली शिकायत के बाद 6 दिसंबर 11 को एफआईआर लिखी गयी और अब तक चार गवाही भी गुजर चुकी है। आप लोगों ने झूठे मुकदमे में फंसाने की जो बात कही है, उसमें सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिकायत मिलने के बाद पहले जांच और फिर प्राथमिकी संभव नहीं है। झूठे मुकदमे में फंसाए जाने व्यक्ति को सताना नहीं चाहिए। हम इस दिशा में प्रयास भी कर रहे हैं। जब भी डीएसपी या एसपी जांच को जाएं, तो सबके सामने यह बात रख देनी चाहिए कि अमुक दोषी नहीं है। जहां तक ट्रैफिक जाम की बात है, उससे वे भी सहमत हैं। कभी-कभी उनको भी सोचना पड़ता है कि दिन के समय उस एरिया में जाएं या न जाएं। समस्या समाधान के लिए हम सबको मिल-बैठकर रास्ता निकालना होगा। बैठक में पुलिस महानिरीक्षक जेएस गंगवार, उपपुलिस महानिरीक्षक एस. रविन्द्रन, ग्रामीण एसपी मनोज कुमार, चैम्बर अध्यक्ष ओपी साह, उपाध्यक्ष शशिमोहन, पूर्व अध्यक्ष जुगेश्वर पांडेय, पीके अग्रवाल, निर्वाचित महासचिव संजय खेमका आदि ने विचार व्यक्त किये।

Wednesday, December 21, 2011

Economic offence cell to book people causing loss to govt


PATNA: An Economic Offence Cell (EOC) under direct control of DGP Abhayanand, has been constituted at the state police headquarters to investigate cases of economic offence by the general public involved in misappropriation and misuse of government money and for confiscation of their property on conviction order passed by the court.

The EOC to be headed by IG, economic offence, Praveen Vashishth would comprise of a DIG (economic offence), SP (food) and SP (economic offence/cyber crime), 10 DSPs, 32 police inspectors, 72 SIs, two programmers, nine havildars and 10 other personnel. Their special training would be held at the CBI Training Centre at Ghaziabad.
The EOC will control the investigation of such economic offence cases by the district police and provide guidance to them to improve the quality of investigation of these cases. The food cell and cyber crime cell and cooperative cell of the police headquarters would be under this EOC, said Abhayanand.
The EOC would be located at the Biscomaun building here. It will apply the provisions of Criminal Law Amendment Act, 1944, which was enacted by the colonial British government to nab economic offenders among the general public, the DGP told TOI.
Abhayanand said that the cell is 'unique' in the sense that it will launch proceedings for confiscation of property of the public who would be found to have caused loss to the government by their involvement in misappropriation and misuse of funds.
The Special Court Act enacted by the government has brought into its net only the government servants involved in misappropriation of government money and on their conviction by the Special Court for confiscation of immovable property of the government official, he said.
He said that the provisions of this Act is being applied by the CBI to nab the general public people causing loss to government. The DGP said that the provision of this 1944 law was never applied at least in the state of Bihar.
The DGP said that he and some other IPS officials, who have been included in the cell, had while in the CBI learnt the use of Criminal Law Amendment Act, 1944, to investigate the cases of economic offence by the public. Now, use of this law for investigation and confiscation of property of the general public involved in causing huge economic loss to the government would be started.
With improvement in the economic situation in Bihar, there has been immense change in the nature of economic offences in the state, he said, adding that the total benefit of the welfare schemes were not reaching the target groups in the society. There is every possibility of misappropriation and misuse of government money during implementation of welfare schemes, he said.

Dolphin mascot for Police Games


PATNA: Bihar DGP Abhayanand along with four other DGs,Ashok Kumar Gupta, Manoje Nath, V Narayan and Shafi Alam on Friday released the mascot for the ensuing All India Police Games to be held from February 1 to 5, 2012, at Mithilesh Stadium here. The mascot for the games is 'dolphin', symbolizing its importance in the Gangetic region.
Speaking on the occasion, Abhayanand said that Bihar had been given a cluster of games, which include volleyball, handball, kabaddi and basketball, to be held during the ensuing 60th All India Police Games. "It is a proud moment for Bihar police to organize such a historic event," he said and added that it was after a lapse of 17 years that Bihar police had been given the responsibility of holding such an event. DG (home guards) Manoje Nath and other senior police officials expressed the hope that the meet would be a success.

Wednesday, December 14, 2011

DGP Abhayanand Initiative



हिंदुस्तान पटना अपने पहले पन्ने पर् लिखते हैं :- 
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Monday, December 5, 2011

डीजीपी अभयानंद ने सभी जिलों के आरक्षी अधीक्षकों को यह हिदायत भेजी है कि अपहरण से जुड़े सभी मामलों का हर हाल में स्पीडी ट्रायल कराया जाये।


पटना, जागरण ब्यूरो : डीजीपी अभयानंद ने सभी जिलों के आरक्षी अधीक्षकों को यह हिदायत भेजी है कि अपहरण से जुड़े सभी मामलों का हर हाल में स्पीडी ट्रायल कराया जाये। पुलिस अधिकारियों को इस बाबत जवाबदेह बनाया जाये। डीजीपी ने रविवार को कहा कि उन्होंने स्पीडी ट्रायल के मामलों की समीक्षा की है। इस क्रम में यह बात सामने आयी कि पिछले कुछ माह के दौरान छुट्टियों की वजह से ट्रायल स्पीडी स्वरूप में नहीं आ पाया। पुन: इस गति को तीव्र करने को ले सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिया गया है। मुख्यालय के स्तर पर इसकी नियमित मानीटरिंग हो रही है।डीजीपी ने बताया कि बेतिया में दर्ज अपहरण मामलों में हर हाल में स्पीडी ट्रायल अपहरण के एक मामले में पुलिस ने स्पीडी ट्रायल करा पांच अपराधियों को आजीवन कारावास की सजा दिलवायी। तीन नवंबर 2009 को बेतिया स्थित गुलाब मेमोरियल कालेज से संजय नाम के एक विद्यार्थी का अपहरण हो गया था। अज्ञात अपराधियों के खिलाफ इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करायी गयी। मामला काफी पेचीदा था। अपहरण के छह दिन बाद फिरौती का फोन आया था। काफी मशक्कत के बाद पुलिस ने अपहृत को बगहा से बरामद किया। इस मामले में आरंभ में जब ट्रायल शुरू हुआ तो रफ्तार काफी धीमी थी। इसके बाद पुलिस मुख्यालय के हस्तक्षेप के बाद ट्रायल में गति आयी और दो दिन पूर्व इस कांड में नामजद पांच अपहर्ताओं को आजीवन कारावास की सजा हुई है। जिन पांच अपराधियों को आजीवन कारावास की सजा हुई है उनमें सुखारी यादव, संतोष साह, प्रदीप श्रीवास्तव, बंटी श्रीवास्तव व शोभा चौधरी शामिल हैं। 

एक आईपीएस का प्रयोग : बंदूक गलाओ, फरसा बनाओ



तीन महीने पहले, 31 अगस्त 2011 को 1977 बैच के बिहार कैडर के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी अभयानंद ने सूबे के पुलिस महानिदेशक की कमान संभाली। तब उनके जेहन में यह सवाल उठा था कि विभिन्न थानों के मालखाने में जब्त अवैध अस्लहों का क्या किया जाए? प्रदेश में  824 पुलिस स्टेशन हैं। सन् 2000 से अगस्त 2011 तक पुलिस ने तकरीबन पौने दो लाख हथियार अपराधियों एवं उग्रवादियों से बरामद किए थे।
उनमें एके 47, कारबाइन, स्टेनगन, रायफल, बंदूक, माउजर, पिस्तौल, देसी कट्टा वगैरह थे। वैसे सूत्रों के मुताबिक अभी प्रांत में औसतन 10 आग्नेयास्त्र  प्रत्येक माह पुलिस के हाथ लगते हैं। हालांकि राजद राज में, खासकर मार्च 2000 से 4 मार्च, 2005 तक पांच सालों में हजारों-लाखों की संख्या में गैर-आईनी हथियार पुलिस ने बटोरे थे।

बहरहाल, प्रांतीय पुलिस प्रमुख की जिम्मेदारी मिलते ही अभयानंद ने पता लगाया कि मालखानों में कितने ऐसे हथियार हैं जिनके मामले अदालत द्वारा निबटाए जा चुके हैं। इस बाबत उन्हें खबर लगी कि 60 हजार अस्लहों के केस बाकायदा खत्म हो गए हैं। डीजीपी ने अदालत से इजाजत लेकर सामाजिक रूप से इस्तेमाल में आने वाले औजार बनाने का फरमान जारी कर डाला। मसलन, दरभंगा में सरिये, फावड़े, बेलचे, कुदाल आदि के निर्माण धड़ल्ले से जारी है। उन्हें पुलिस की मौजूदगी में लोहार पहले गलाते हैं। तब उपकरण का रूप प्रदान किया जाता है। ज्यादातर कृषि संबंधित उपकरण ही फिलवक्त तैयार करने का जोर पुलिस महानिदेशक का है। उम्मीद है कि बहुत ही कम दाम पर औजार काश्तकारों को उपलब्ध कराये जाएंगे। लोहारों को भी उचित राशि मुहैया कराई जाएगी। मुजफफरपुर में भी औजार ढालने का काम रफतार पकड़ चुका है।

सवाल उठता है कि अस्लहों को नेस्ताबूद कर उनसे उपकरण बनाना क्या न्यायसंगत है? अभयानंद शुक्रवार को बताते हैं- पुलिस मैन्युअल में स्पष्ट प्रावधान है कि डीजीपी उन शस्त्रों को नष्ट कर सकते हैं जिन्हें पुलिस ने जब्त कर रखा है और जिनकी उपयोगिता नहीं है। बेशक इसमें सावधसनी यही बरतनी होती है कि जिस कांड में हथियार पकड़े गए हैं, उस मुकदमे को कोर्ट ने निर्णय दे कर दिया हो। सीआरपीसी की धारा के तहत ही न्यायालय इस प्रकार के आदेश पारित करती है।

आर्थिक अपराध  समाज, राज्य एवं देश को दीमक की तरह चाट रहा है, यह टिप्पणी पुलिस महानिदेशक ने  की। लिहाजा, इस पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से अभयानंद ने आर्थिक अपराध इकाई बनाने का प्रस्ताव भी सरकार के पास भेजा है। उन्हें इसकी अधिसूचना शीघ्र ही जारी होने की उम्मीद है। बकौल डीजीपी इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक जिले में दो-तीन अफसरों को रखा जाएगा। वे दर्ज आर्थिक अपराधों का ही सिर्फ अनुसंधान करेंगे। इन अधिकारियों को ट्रेनिंग सीबीआइ देगी। गाजियाबाद में उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा। इस सिलसिले में सीबीआइ के निदेशक से गुजारिश की गई है। इसके अलावा यहां एक और आर्थिक अपराध यूनिट संगठित की गई है। इसका लक्ष्य होगा कालेधन पर रोक लगाना, जिस स्रोत से कालेधन का जन्म हो रहा है, उसे ही मटियामेट करना, ध्वस्त करना, जो राजस्व की हानि के लिए जिम्मेदार हैं, विकास कार्यो में घोटाले कर रहे हैं, कानून के दायरे में उनकी चल-अचल संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। भारत सरकार की एजेंसियों से भी अभयानंद ने अनुरोध किया है कि वे उनकी सहायता करें। वह खुलासा करते हैं कि आर्थिक अपराध के लिए पुलिस पहली मर्तबा तफतीश करेगी। उनके अनुसार आर्थिक अपराध का सीधा रिश्ता माओवादियों, नक्सलियों के बढ़ने से है। साथ ही नक्सलवादी इलाकों में तरक्की के कार्य होने भी आवश्यक हैं। नक्सली भी तो हमारी तरह ही इस मुल्क के नागरिक हैं।

खेल के क्षेत्र  में अभयानंद ने चक दे बिहार का जुमला उछाल रखा है। बीएमपी मैदान, पटना में उन्होंने बास्केटबॉल के अंतरराष्ट्रीय कोर्ट का निर्माण शुरू करवा दिया है। एक कोर्ट की स्थापना पर करीब 35 लाख की रकम खर्च होगी। कबड्डी चूंकि अब मिट्टी में नहीं खेली जाती, बल्कि मैट पर उसकी उठापटक होती है, इसलिए अभयानंद की पहल पर विभाग मैट की खरीदारी करने वाला है। अभयानंद का ज्ड्रीम प्रोजेक्ट है बीएमपी ग्राउंड पटना को खेल गांव में तब्दील करना। चक दे बिहार का नारा अभयानंद ने 2008 में उस वक्त दिया था जब वे बीएमपी के एडीजी थे। इसे अमलीजामा पहनाने वास्ते उन्होंने डेढ़ सौ गरीब बच्चों का चयन किया। फिर उनमें से 75 लोगों को बास्केटबॉल, हैंडबॉल, एथलीट एवं हॉकी के खेल में कोच ने तीन सालों तक ट्रेंड करने में अपना तन-मन लगाया। नतीजतन, पूर्वी क्षेत्र एथलीट चैंपियनशिप प्रतियोगिता में चार लड़कों ने स्वर्ण तथा रजत पदक जीता। यह एथलीट प्रतियोगिता कोलकाता में हुई थी। जूनियर नेशनल बास्केटबॉल चैंपियन (19 वर्ष के अंदर के लड़के), स्कूल गेम फेडरेशन ऑफ इंडिया, नेशनल यूथ बास्केटबॉल चैंपियनशिप (17 साल तक के नौजवान) में नीतीश कुमार, रूपेश कुमार, सोनू कुमार, विकास गुप्ता चुने गए। आज की तारीख में सभी के सभी बिहार बास्केटबॉल टीम के अंग हैं। हैंडबॉल के लिए पांच लड़के-लड़कियां इधर चेन्नई के लिए रवाना हुए हैं। वहां राष्ट्रीय हैंडबॉल चैंपियनशिप होने जा रही है। हिंदुस्तान के कई प्रदेशों में 23 बच्चों ने जूनियर एवं सीनियर हॉकी चैंपियनशिप में अपना शानदार प्रदर्शन दिखाया है। सन् 2010 और 2011 में उन्हें मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय हॉकी चैंपियनशिप खेलने का भी मौका मिला है। जाहिर है चक दे बिहार ने देश में अपना परचम लहराया है। कुश्ती में अभयानंद ने कामेश्वर को बतौर कोच बहाल किया था। वही कामेश्वर कुश्ती कोच बनकर लंदन जा रहे हैं। डीजीपी के समक्ष बड़े-बड़े वेकों को लेकर छिड़ी गैंगवार एवं छोटी-सी घटना होने पर लोगों द्वारा कानून अपने हाथ में लेना अभी सबसे बड़ी चुनौती है। इस पर सख्ती से अंकुश नहीं लगाया गया तो सारे नुस्खे धरे के धरे रह जाएंगे।  

Economic offence cell to book people causing loss to govt


The Times of India Writes : 
PATNA: An Economic Offence Cell (EOC) under direct control of DGP Abhayanand, has been constituted at the state police headquarters to investigate cases of economic offence by the general public involved in misappropriation and misuse of government money and for confiscation of their property on conviction order passed by the court.
The EOC to be headed by IG, economic offence, Praveen Vashishth would comprise of a DIG (economic offence), SP (food) and SP (economic offence/cyber crime), 10 DSPs, 32 police inspectors, 72 SIs, two programmers, nine havildars and 10 other personnel. Their special training would be held at the CBI Training Centre at Ghaziabad.

The EOC will control the investigation of such economic offence cases by the district police and provide guidance to them to improve the quality of investigation of these cases. The food cell and cyber crime cell and cooperative cell of the police headquarters would be under this EOC, said Abhayanand.
The EOC would be located at the Biscomaun building here. It will apply the provisions of Criminal Law Amendment Act, 1944, which was enacted by the colonial British government to nab economic offenders among the general public, the DGP told TOI.
Abhayanand said that the cell is 'unique' in the sense that it will launch proceedings for confiscation of property of the public who would be found to have caused loss to the government by their involvement in misappropriation and misuse of funds.
The Special Court Act enacted by the government has brought into its net only the government servants involved in misappropriation of government money and on their conviction by the Special Court for confiscation of immovable property of the government official, he said.
He said that the provisions of this Act is being applied by the CBI to nab the general public people causing loss to government. The DGP said that the provision of this 1944 law was never applied at least in the state of Bihar.
The DGP said that he and some other IPS officials, who have been included in the cell, had while in the CBI learnt the use of Criminal Law Amendment Act, 1944, to investigate the cases of economic offence by the public. Now, use of this law for investigation and confiscation of property of the general public involved in causing huge economic loss to the government would be started.
With improvement in the economic situation in Bihar, there has been immense change in the nature of economic offences in the state, he said, adding that the total benefit of the welfare schemes were not reaching the target groups in the society. There is every possibility of misappropriation and misuse of government money during implementation of welfare schemes, he said.

Wednesday, November 23, 2011

पद से कहीं ऊंचा है कांस्टेबल रंजीता का काम


पद से कहीं ऊंचा है कांस्टेबल रंजीता का काम


Ranjita significantly higher post constable bihar football
बिहार के मुंगेर जिले के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में जब कांस्टेबल के पद पर रंजीता मिश्रा ने कार्यभार सम्भाला तो यह कोई नहीं जानता था कि वह इस क्षेत्र में एक बेमिसाल कहानी लिख डालेंगी।

भारतीय महिला फुटबॉल टीम की सदस्य रह चुकी रंजीता से प्रशिक्षण प्राप्त मुंगेर के चार बच्चे पिछले वर्ष राष्ट्रीय फुटबॉल अंडर-13 टीम में चयनित हो चुके हैं। इस साल भी एक बच्चे का चयन राष्ट्रीय फुटबॉल टीम अंडर-14 में हुआ है, जबकि चार बच्चों का चयन किशनगंज भारतीय प्राधिकरण प्रशिक्षण केंद्र (साई) के लिए किया गया है। उन्होंने पुलिस में अपनी ड्यूटी करते हुए इन बच्चों को फुटबॉल का प्रशिक्षण दिया।

मुंगेर जिला पुलिस बल में रंजीता वर्ष 2007 में कांस्टेबल के तौर पर शामिल हुई थीं। उनके लिए यह जगह नई नहीं थी, क्योंकि पिता की नौकरी के दौरान वह कुछ समय तक उनके साथ यहां रह चुकी थीं। उन्होंने बताया, ‘जब मैं छोटी थी तो गंगा किनारे छोटे बच्‍चों को लोगों का सामान ढोते देखती थी। इसके बदले मिले पैसों से बच्चे नशा करते थे। कांस्टेबल की नौकरी मिलने के बाद मैंने इन बच्‍चों को इकट्ठा किया और इनका नामांकन स्कूल में कराया। कुछ दिन बाद उन्हें फुटबॉल का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया।’

आज उनके पास 75 बच्‍चे प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं, जिनके अभिभावक रिक्शा चालक हैं या फिर सफाई और मजदूरी का काम करते हैं। उनके मुताबिक ‘इस काम के लिए मुझे न तो किसी औद्योगिक घराने से कोई मदद मिली और न ही सरकार से। अपने वेतन और समय-समय पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मदद से ही बच्चों को प्रशिक्षण दे रही हूं। उन्हें खेल सामग्री भी समय-समय पर पुलिस अधिकारी ही उपलब्‍ध कराते हैं।’

बिहार के भोजपुर की रहने वाली रंजीता मुंगेर के पोलो मैदान में जब बच्‍चों को फुटबॉल का प्रशिक्षण देती हैं तो कई लोग उन्हें देखने के लिए जमा हो जाते हैं। वह बच्चों को पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्‍दुल कलाम की उस पंक्ति का पाठ पढ़ा रही हैं, जिसमें उन्होंने ऊंचे सपने देखने की बात कही है, ताकि उन्हें पूरा करने की कोशिश की जा सके।

पिछले दिनों राज्य के पुलिस महानिदेशक अभयानंद ने अपने मुंगेर दौरे के दौरान रंजीता से मुलाकात की थी। इस काम के लिए उन्हें शाबाशी देते हुए पुलिस महानिदेशक ने रंजीता को पांच हजार रुपये का पुरस्कार देने की भी घोषणा की थी।

पद से कहीं ऊंचा है कांस्टेबल रंजीता का कार्य




बिहार के मुंगेर जिले के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में जब कांस्टेबल के पद पर रंजीता मिश्रा ने कार्यभार सम्भाला तो यह कोई नहीं जानता था कि वह इस क्षेत्र में एक बेमिसाल कहानी लिख डालेंगी।
भारतीय महिला फुटबॉल टीम की सदस्य रह चुकी रंजीता से प्रशिक्षण प्राप्त मुंगेर के चार बच्चों पिछले वर्ष राष्ट्रीय फुटबॉल अंडर-13 टीम में चयनित हो चुके हैं। इस साल भी एक बच्चों का चयन राष्ट्रीय फुटबॉल टीम अंडर-14 में हुआ है, जबकि चार बच्चों का चयन किशनगंज भारतीय प्राधिकरण प्रशिक्षण केंद्र (साई) के लिए किया गया है। उन्होंने पुलिस में अपनी ड्यूटी करते हुए इन बच्चों को फुटबॉल का प्रशिक्षण दिया।
मुंगेर जिला पुलिस बल में रंजीता वर्ष 2007 में कांस्टेबल के तौर पर शामिल हुई थीं। उनके लिए यह जगह नई नहीं थी, क्योंकि पिता की नौकरी के दौरान वह कुछ समय तक उनके साथ यहां रह चुकी थीं। उन्होंने बताया कि जब मैं छोटी थी तो गंगा किनारे छोटे बच्चों को लोगों का सामान ढोते देखती थी। इसके बदले मिले पैसों से बच्चों नशा करते थे। कांस्टेबल की नौकरी मिलने के बाद मैंने इन बच्चों को इकट्ठा किया और इनका नामांकन स्कूल में कराया। कुछ दिन बाद उन्हें फुटबॉल का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया।
आज उनके पास 75 बच्चों प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं, जिनके अभिभावक रिक्शा चालक हैं या फिर सफाई और मजदूरी का काम करते हैं। उनके मुताबिक, इस काम के लिए मुझे न तो किसी औद्योगिक घराने से कोई मदद मिली और न ही सरकार से। अपने वेतन और समय-समय पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मदद से ही बच्चों को प्रशिक्षण दे रही हूं। उन्हें खेल सामग्री भी समय-समय पर पुलिस अधिकारी ही उपलब्ध कराते हैं।
बिहार के भोजपुर की रहने वाली रंजीता मुंगेर के पोलो मैदान में जब बच्चों को फुटबॉल का प्रशिक्षण देती हैं तो कई लोग उन्हें देखने के लिए जमा हो जाते हैं। वह बच्चों को पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की उस पंक्ति का पाठ पढ़ा रही हैं, जिसमें उन्होंने ऊंचे सपने देखने की बात कही है, ताकि उन्हें पूरा करने की कोशिश की जा सके।
पिछले दिनों राज्य के पुलिस महानिदेशक अभयानंद ने अपने मुंगेर दौरे के दौरान रंजीता से मुलाकात की थी। इस काम के लिए उन्हें शाबाशी देते हुए पुलिस महानिदेशक ने रंजीता को पांच हजार रुपये का पुरस्कार देने की भी घोषणा की थी।

Friday, November 18, 2011

डीजीपी ने की कम्यूनिटी पुलिस की कार्यो की सराहना


रविवार को विश्वप्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला पहुंचे सूबे के डीजीपी अभयानंद ने अपराध अनुसंधान प्रदर्शनी के उपरांत एसपीओ कैम्प को देखा। यहां उन्हें कम्यूनिटी पुलिस के राजीव मुनमुन तथा निर्भय कुमार द्वारा मेले में एसपीओ के कार्यकलापों से अवगत कराया गया। इसके पूर्व शिविर में उनके प्रवेश करते ही एसपीओ के जवानों ने तालियां बजाकर उनका अभिनंदन तथा स्वागत किया।
पुलिस प्रमुख इन युवाओं से मिलकर खुश हुए। तत्पश्चात उन्होंने वहां रखे आगंतुक रजिस्टर पर लिखा कम्यूनिटी पुलिस अच्छा काम कर रही है और अच्छा करें। इस क्रम में उन्होंने मुनमुन के पीठ थपथपाये तथा वहां खड़े अन्य युवाओं का उत्साहव‌र्द्धन किया। इस अवसर पर अपर पुलिस महानिदेशक अमरीक सिंह निम्ब्रान, सारण के एसपी एके सत्यार्थी तथा डीएसपी वीरेन्द्र प्रसाद रजक सहित पुलिस के अनेक वरीय पदाधिकारी वहां मौजूद थे।

Thursday, November 17, 2011

In Bihar, Turning Guns into Farm Tools -


Courtsey : The Newyork Times 


In Bihar, Turning Guns into Farm Tools

From left, Sunil Thakur with his family, overseen by Muzaffarpur police chief Rajesh Kumar and executive magistrate Ramesh Kumar Ratnam, hammering country-made pistols into farm tools.Prashant RaviFrom left, Sunil Thakur with his family, overseen by Muzaffarpur police chief Rajesh Kumar and executive magistrate Ramesh Kumar Ratnam, hammering country-made pistols into farm tools.


Blacksmith Sunil Thakur had never felt as important in his life as he did on Nov. 4, when the district police chief, an executive magistrate and a posse of junior officials visited his makeshift roadside furnace.
They handed him six country-made pistols, known as kattas, and asked him to transform them into farm and gardening tools. As a crowd assembled, the blacksmith heated the guns, and then hammered the red-hot metal for nearly an hour, shaping them into a hoe, a clipper, a sickle and a shovel.
This transformation of guns into tools in Muzaffarpur, about 50 miles from Bihar’s capital of Patna, was the first in a state-wide police initiative aimed at reducing the number of guns in crime-ridden Bihar. According to the National Crime Records Bureau, 3,362 people were killed in violent crimes, defined as murder either by guns, knives or during robbery, in Bihar last year. This makes it India’s second-most crime-prone state after Uttar Pradesh, which tops the list with 4,456 cases.
The state’s new Director General of police, Abhayanand, who goes by just one name, is behind the initiative and a slew of larger reforms he hopes will re-establish the rule of law in Bihar.
Since he took the job in August, Mr. Abhayanand has also pushed for speedy trials in fast-track courts and appointed retired army personnel as special auxiliary police forces. His force is seizing property bought by members of the mafia using fake names. If details on the sale deed are found to be fraudulent, property will be claimed as a government asset after a six-month wait. Police say the move will help check corruption.
Country-made pistols or kattas, being melted into farm tools.
Prashant RaviCountry-made pistols or kattas, being melted into farm tools.
At present, more than 60,000 illegal firearms, stored in police stations across Bihar, are lined up to be melted and made into farming or agricultural tools. “The seized illegal weapons in store at police stations are of no use once the case is over. They stink like dead bodies,” Mr. Abhayanand said in an interview in the modest living room of his sprawling ancestral home.
Mr. Abhayanand said the Bihar police manual gave him the idea to transform these weapons. Bihar courts, under section 452 of the national criminal procedure code, 1973, can order the destruction of seized weapons once the trial is over.
“This provision made me think of converting thousands of seized weapons, lying in over 800 police stations in Bihar, into something constructive,” Mr. Abhayanand said with a smile. Bihar police seize about 60,000 weapons every year.
Before a gun can be melted down, there is plenty of paperwork. The district police have to acknowledge that the case a weapon is associated with is closed, then verify details of the arms seized from court records; and finally get a court order to destroy the weapon. The melting is carried out in front of an executive magistrate and a videographer, to produce documentary evidence.
By destroying seized firearms, police say they can ward off allegations of planted evidence. Police are regularly accused of falsely implicating people by planting weapons, kept in malkhanas, or storehouses, at police stations, which were not with the criminal at the time of arrest.
The destruction of these weapons will ensure that such allegations can no longer be made, Bihar police say.
Responses to the initiative have been mixed so far. Satish Kumar, who owns a vast tract of agricultural land in Punpun of Patna district, dismisses the move as “impractical and publicist.”
“It smacks of positive symbolism but doesn’t sound practically feasible. It will require a sustained effort from the overburdened and staff-starved Bihar police to turn the weapons into farming tools”, said Mr. Kumar, an engineer-turned-farmer.
But his neighbor, Sudhir Sharma, also a farmer, thinks otherwise. “We will be able to get our farming tools at cheaper rates and it will also help providing more work to local village toolmakers,” he said.
The Bihar-based writer is an assistant editor for The Pioneer. He has also reported for BBC online and worked for Outlook magazine for five years.

Sunday, November 6, 2011